हठयोगhaṭha-yoga · बल का योग
हठ योग, शरीर से चलने वाला मूल मार्ग
3 मिनट में पढ़ें · 18 अक्टूबर 2026 को अद्यतन · स्रोत 18 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए
संक्षेप में
हठ योग योग का वह मार्ग है जो शरीर और श्वास के माध्यम से काम करता है। इसकी शास्त्रीय पुस्तिका, पंद्रहवीं सदी की हठयोग प्रदीपिका, चार चरण सिखाती है, आसन, प्राणायाम, मुद्रा-बंध और समाधि, और ये सब मन को राज योग के लिए तैयार करते हैं। लगभग हर आधुनिक योग शैली इसी से निकली है।
आज जब लोग «योग» कहते हैं तो उनका मतलब ज्यादातर आसनों से होता है, और आसन हठ योग से आते हैं। फिर भी हठ ग्रंथ फिटनेस की पुस्तिकाएँ नहीं हैं। वे शरीर, श्वास और ध्यान के एक अनुशासित मार्ग का वर्णन करते हैं, जिसका लक्ष्य वही है जो पतंजलि का है: शांत मन। यह पृष्ठ बताता है कि ग्रंथ क्या कहते हैं, और आपके अभ्यास के लिए उसका क्या अर्थ है।
शब्द का अर्थ
संस्कृत में हठ का अर्थ है बल या प्रयत्न। हठ योग वह योग है जो मन को स्थिर करने के लिए शरीर और श्वास के प्रयत्न का उपयोग करता है। बाद के स्रोत, जैसे योगबीज और हठप्रदीपिका पर ब्रह्मानंद की ज्योत्स्ना टीका, दोनों अक्षरों को गूढ़ अर्थ में भी पढ़ते हैं: ह सूर्य और ठ चंद्र, श्वास की दो विपरीत धाराओं का मिलन। दोनों अर्थ एक ही बात की ओर इशारा करते हैं: हठ योग स्थूल, यानी शरीर और श्वास, पर काम करके सूक्ष्म तक पहुँचता है।
हठविद्या … प्रोन्नतराजयोगमारोढुमिच्छोरधिरोहिणीव
haṭha-vidyā … pronnata-rāja-yogam āroḍhum icchor adhirohiṇīva
हठ योग की विद्या उसके लिए सीढ़ी के समान है जो राज योग के ऊँचे शिखर पर चढ़ना चाहता है।
संक्षिप्त इतिहास
| काल | ग्रंथ | क्या जोड़ता है |
|---|---|---|
| 11वीं सदी | अमृतसिद्धि | हठ की विधियाँ (बिंदु, श्वास, मुद्राएँ) सिखाने वाला सबसे पुराना ज्ञात ग्रंथ |
| 13वीं सदी | दत्तात्रेययोगशास्त्र | मंत्र, लय और राज योग के साथ चार योगों में से एक के रूप में हठ योग |
| 15वीं सदी | स्वात्माराम की हठप्रदीपिका | शास्त्रीय संश्लेषण, लगभग बीस पुराने ग्रंथों से संकलित |
| 17वीं सदी | हठरत्नावली | और अधिक आसन और साधनाएँ |
| लगभग 1700 | घेरंड संहिता | सात अंगों वाला हठ, 32 आसन |
| 20वीं सदी | कृष्णमाचार्य, शिवानंद और अन्य | आधुनिक आसन-प्रधान योग, जिससे आज की शैलियाँ निकलीं |
हठप्रदीपिका स्वयं महान सिद्धों की एक परंपरा गिनाती है, जो आदिनाथ (शिव), मत्स्येंद्र, शाबर और गोरक्ष से शुरू होती है (1.5-1.9)। पहले यही ग्रंथ पढ़ें: हठयोग प्रदीपिका का परिचय।
हठयोग प्रदीपिका के चार चरण
| अध्याय | विषय | क्या सिखाता है |
|---|---|---|
| 1 | आसन | पंद्रह आसन, अभ्यास का स्थान, योगी का आहार |
| 2 | प्राणायाम | श्वास का नियमन और छह शुद्धि-क्रियाएँ (षट्कर्म) |
| 3 | मुद्रा और बंध | श्वास को दिशा देने वाली मुद्राएँ और बंध |
| 4 | समाधि | समाधि और भीतर का नाद |
लेखक स्वात्माराम कहते हैं कि उन्होंने हठ योग परंपरा के आचार्यों से सीखा, जिनमें मत्स्येंद्र और गोरक्ष हैं (1.4)। उन्होंने यह ग्रंथ परस्पर विरोधी मतों के अंधेरे में भटकते लोगों के लिए «एक दीपक की तरह» रचा (1.3)।
ग्रंथों में
«हठ योग का पहला अंग होने के कारण आसन का वर्णन पहले किया जाता है। स्थिर आसन, आरोग्य और शरीर के हल्केपन के लिए इसका अभ्यास करना चाहिए।» हठयोग प्रदीपिका 1.19, पंचम सिंह के अंग्रेजी अनुवाद (1915) से, हमारा अनुवाद।
आसन
पहले अध्याय के पंद्रह आसनों में अधिकतर बैठकर किए जाते हैं, कुछ लेटकर या हाथों पर संतुलन बनाकर, और खड़ा कोई नहीं: स्वस्तिकासन, गोमुखासन, वीरासन, कूर्मासन, कुक्कुटासन, उत्तानकूर्मासन, धनुरासन (धनुरासन), मत्स्येंद्रासन (अर्धमत्स्येन्द्रासन), पश्चिमोत्तानासन (पश्चिमोत्तानासन), मयूरासन, शवासन (शवासन), और फिर चार प्रमुख बैठने वाले आसन, सिद्ध, पद्म (पद्मासन), सिंह और भद्र। आधुनिक कक्षाओं के खड़े क्रम और सूर्य नमस्कार बाद में आए।
श्वास
दूसरा अध्याय एक सिद्धांत से खुलता है जो पूरे हठ योग का सार है: «वायु चलती है तो चित्त चलता है; वायु स्थिर हो तो चित्त स्थिर होता है» (चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्, 2.2)। यह नाड़ियों की शुद्धि के लिए अनुलोम विलोम (नाड़ी शोधन) सिखाता है, फिर आठ प्रकार के कुम्भक। देखें प्राणायाम।
मुद्रा, बंध और समाधि
तीसरा अध्याय दस मुद्राओं और तीन बंधों का वर्णन करता है, जिनका उद्देश्य श्वास को मध्य नाड़ी में ले जाना और कुंडलिनी को जगाना है। चौथा अध्याय समाधि पर है, जिसमें भीतर के नाद पर एक लंबा अंश है (नाद योग)।
हठ और राज योग
ग्रंथ साफ कहता है: हठ योग के बिना राज योग सिद्ध नहीं होता, और राज योग के बिना हठ योग नहीं (2.76)। यहाँ राज योग का अर्थ है वह शांत मन जिसकी परिभाषा पतंजलि योगसूत्र 1.2 में देते हैं: योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। देखें राज योग।
बातें नहीं, अभ्यास
स्वात्माराम जोर देते हैं कि हठ योग हर अभ्यास करने वाले के लिए है, उसकी स्थिति जो भी हो:
युवा वृद्धोऽतिवृद्धो वा व्याधितो दुर्बलोऽपि वा । अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति सर्वयोगेष्वतन्द्रितः ॥
yuvā vṛddho 'tivṛddho vā vyādhito durbalo 'pi vā | abhyāsāt siddhim āpnoti sarva-yogeṣv atandritaḥ ||
युवा हो, वृद्ध हो या अति वृद्ध, रोगी हो या दुर्बल: जो आलस्य छोड़कर सब योगों का अभ्यास करता है, वह अभ्यास से सिद्धि पाता है।
अगले दो श्लोक जोड़ते हैं कि सिद्धि न ग्रंथ पढ़ने से मिलती है, न योगी का वेश पहनने या उसकी बातें करने से: «केवल अभ्यास ही सिद्धि का कारण है» (1.68-1.69)।
आज की हठ योग कक्षा कैसी दिखती है
किसी स्टूडियो या भारतीय आश्रम में «हठ» कक्षा आमतौर पर 60 से 90 मिनट की होती है और ग्रंथों के क्रम पर चलती है:
- आरंभ: बैठना, कुछ साँसें, अक्सर ॐ या कोई मंत्र।
- वार्म-अप और सूर्य नमस्कार।
- कई साँसों तक टिके आसन: खड़े, आगे झुकने वाले, पीछे झुकने वाले, मरोड़, और सर्वांगासन जैसे उलटे आसन।
- शवासन में विश्राम।
- प्राणायाम, अक्सर अनुलोम विलोम।
- थोड़ी देर ध्यान।
उदाहरण के लिए, शिवानंद परंपरा ने बारह मूल आसनों को एक तय क्रम में बाँधा; दूसरी परंपराओं, जैसे अयंगर योग, अष्टांग विन्यास या बिहार स्कूल, ने उसी जड़ से अपनी-अपनी पद्धति विकसित की।
हठ योग सुरक्षित ढंग से
शुरुआत रोज दस मिनट से करें: कुछ आसन, कुछ मिनट प्राणायाम, पाँच मिनट विश्राम। घर पर योग पहला सत्र देता है, और आसन वाला अध्याय एक-एक आसन समझाता है। हठ योग की दूसरे मार्गों से तुलना के लिए देखें योग के मार्ग।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या हठ योग एक सौम्य शैली है?
स्टूडियो में यह शब्द अक्सर धीमी, पारंपरिक कक्षा के लिए प्रयोग होता है। ग्रंथों में हठ योग एक पूरा अनुशासन है, जिसमें कठिन प्राणायाम और मुद्राएँ भी हैं, जिन्हें गुरु के साथ धीरे-धीरे सीखा जाता है।
हठयोग प्रदीपिका किसने लिखी?
ग्रंथ अपने लेखक का नाम स्वात्माराम बताता है, जो कहते हैं कि उन्होंने इसे मत्स्येंद्र और गोरक्ष समेत परंपरा के आचार्यों से सीखा। विद्वान इसे पंद्रहवीं सदी का मानते हैं।
हठ का अर्थ क्या है?
संस्कृत में हठ का अर्थ है बल या प्रयत्न। बाद के ग्रंथ ह और ठ को गूढ़ अर्थ में सूर्य और चंद्र भी पढ़ते हैं, दो विपरीत धाराओं का मिलन, पर शाब्दिक अर्थ बल ही है।
हठ योग और विन्यास योग में क्या अंतर है?
विन्यास आसनों को श्वास के साथ बहते क्रम में जोड़ने का आधुनिक ढंग है, जो बीसवीं सदी में हठ योग से विकसित हुआ। हठ कक्षा में आमतौर पर हर आसन में देर तक रुकते हैं और प्राणायाम तथा विश्राम भी होता है।
स्रोत
- The Hatha Yoga Pradipika, translated by Pancham Sinh (Allahabad, Panini Office, 1915; बाद का पुनर्मुद्रण), Internet Archive 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- स्वात्माराम की हठयोगप्रदीपिका, संस्कृत पाठ (GRETIL, गॉटिंगेन विश्वविद्यालय) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- पतंजलि, योगसूत्र, संस्कृत पाठ (GRETIL, गॉटिंगेन विश्वविद्यालय) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- James Mallinson and Mark Singleton, Roots of Yoga (Penguin Classics, 2017) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- Bhat R, Srinivasan TM. The Haṭhayogapradīpikā: Jyotsnāyutā (book review). International Journal of Yoga, 2017 DOI 10.4103/ijoy.IJOY_19_17 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया