राजयोगrāja-yoga · राजसी योग
राज योग, मन का राजमार्ग
3 मिनट में पढ़ें · 18 अक्टूबर 2026 को अद्यतन · स्रोत 18 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए
संक्षेप में
राज योग, यानी राजसी योग, वह मार्ग है जो एकाग्रता और ध्यान के जरिए सीधे मन पर काम करता है। हठयोग प्रदीपिका में यह लक्ष्य का नाम है, समाधि, जिसकी तैयारी हठ योग करता है। स्वामी विवेकानंद की पुस्तक राज योग (1896) के बाद से यह शब्द आमतौर पर पतंजलि के योगसूत्र के आठ अंगों वाले मार्ग के लिए प्रयोग होता है।
राज का अर्थ है राजा। राज योग «योगों का राजा» है, वह मार्ग जो सीधे मन तक जाता है, जहाँ अंत में बाकी मार्ग भी पहुँचते हैं। यह आपसे लचीला होने या स्वभाव से भक्त होने की माँग नहीं करता। यह कहता है: बैठिए, अपने मन को देखिए, और लौटते रहिए, दिन-ब-दिन।
यह शब्द कहाँ से आया
इस नाम के कई जीवन रहे हैं, और उन्हें जानने से बहुत सी उलझन सुलझ जाती है।
| काल | «राज योग» का अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| 12वीं सदी | सर्वोच्च योग, मन से परे की अवस्था | अमनस्क, एक शैव ग्रंथ, इस शब्द की परिभाषा देने वाला पहला (बर्च 2013) |
| 15वीं सदी | हठ योग का लक्ष्य: समाधि | हठप्रदीपिका 1.1-1.2, 4.3-4.4 |
| 16वीं सदी से | पतंजलि के योग का नाम | योगसूत्र की टीकाएँ |
| 1896 | पतंजलि के आठ अंग, पश्चिम के सामने | स्वामी विवेकानंद, राज योग, न्यूयॉर्क |
स्वयं पतंजलि राज योग शब्द का कहीं प्रयोग नहीं करते। वे अपने मार्ग को बस योग कहते हैं, और उसकी विधि को अष्टांग, यानी आठ अंग।
हठयोग प्रदीपिका में राज योग
हठ योग की यह पंद्रहवीं सदी की पुस्तिका अपने को राज योग से नीचे रखकर शुरू होती है, जैसे शिखर के नीचे सीढ़ी:
प्रणम्य श्रीगुरुं नाथं स्वात्मारामेण योगिना । केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिश्यते ॥
praṇamya śrī-guruṃ nāthaṃ svātmārāmeṇa yoginā | kevalaṃ rāja-yogāya haṭha-vidyopadiśyate ||
श्री गुरु नाथ को प्रणाम करके योगी स्वात्माराम केवल राज योग के लिए हठ विद्या का उपदेश करते हैं।
चौथे अध्याय में वह राज योग के पर्यायवाची गिनाती है, जिससे पता चलता है कि लेखक के लिए इस शब्द का क्या अर्थ था: एक अवस्था, कोई तकनीक नहीं।
राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी । अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम् ॥
rāja-yogaḥ samādhiś ca unmanī ca manonmanī | amaratvaṃ layas tattvaṃ śūnyāśūnyaṃ paraṃ padam ||
राज योग, समाधि, उन्मनी और मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्य जो शून्य नहीं, परम पद…
अगला श्लोक सूची पूरी करता है (अमनस्क, अद्वैत, निरालंब, निरंजन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुरीय) और कहता है: «ये सब शब्द एक ही अर्थ रखते हैं» (4.4)। ग्रंथ दूसरी दिशा में भी उतना ही दृढ़ है। राज योग के बिना हठ योग व्यर्थ परिश्रम है: «जो राज योग को न जानकर केवल हठ का अभ्यास करते हैं, उन्हें मैं परिश्रम के फल से वंचित अभ्यासी मानता हूँ» (4.79)। और 2.76 का नियम: हठ के बिना राज योग सिद्ध नहीं होता, और राज के बिना हठ नहीं। और पढ़ें: हठ योग।
पतंजलि के मार्ग के रूप में राज योग
सोलहवीं सदी से, और 1896 में विवेकानंद के साथ निर्णायक रूप से, राज योग का अर्थ योगसूत्र की विधि हो गया। आज ज्यादातर शिक्षक इसी अर्थ में यह शब्द प्रयोग करते हैं। इसकी परिभाषा दूसरा सूत्र है:
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥
yogaś citta-vṛtti-nirodhaḥ ||
चित्त की वृत्तियों का शांत हो जाना ही योग है।
इस निरोध के लिए पतंजलि दो साधन देते हैं, «अभ्यास और वैराग्य» (अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः, 1.12), और फिर आठ अंग, नैतिकता से समाधि तक। पूरा पाठ, शब्दशः, योगसूत्र में है।
आज राज योग का अभ्यास कैसा दिखता है
कोई एक «राज योग कक्षा» नहीं है। आठ अंगों पर बनी रोज की बैठक कुछ ऐसी हो सकती है, लगभग आधे घंटे की:
| समय | अभ्यास | अंग |
|---|---|---|
| 5 मिनट | स्थिर बैठना, रीढ़ सीधी, आँखें बंद | आसन |
| 5 मिनट | नाक से धीमी साँस, फिर बिना कुम्भक के अनुलोम विलोम | प्राणायाम |
| 3 मिनट | आवाजों को सुनना, उनके पीछे न जाना | प्रत्याहार |
| 10-20 मिनट | एक विषय पर ध्यान: साँस, ॐ, कोई मंत्र, भ्रूमध्य | धारणा, ध्यान |
| 5 मिनट | किसी सूत्र को पढ़ना और उस पर मनन | स्वाध्याय (नियम) |
दिन भर यह अभ्यास यम और नियम के रूप में चलता रहता है: वाणी पर ध्यान, संतोष, अहिंसा। देखें यम और नियम।
जानने योग्य
राज योग नियमितता से मापा जाता है, अवधि से नहीं। रोज एक ही समय पर पंद्रह मिनट का अभ्यास सप्ताह में एक बार के एक घंटे से अधिक काम करता है। पतंजलि कहते हैं कि अभ्यास तब दृढ़ होता है जब उसे «लंबे समय तक, बिना रुकावट और आदर के साथ» किया जाए (1.14)।
यह किसके लिए है
- जो ध्यान की ओर और मन कैसे काम करता है, यह समझने की ओर खिंचते हैं।
- जो कठिन आसन नहीं कर सकते: राज योग के लिए बस एक स्थिर आसन चाहिए, जमीन पर या कुर्सी पर।
- दूसरे मार्गों के साधक: भगवद्गीता अपना पूरा छठा अध्याय ध्यान को देती है, आसन, दृष्टि और उस स्थिर मन के साथ जो «हवा से बचे स्थान में रखे दीपक की तरह» है (6.19)।
शुरुआत कैसे करें, कदम दर कदम
- एक तय समय और स्थान चुनें। परंपरा में सुबह जल्दी का समय चुना जाता है।
- गद्दी, मोड़े हुए कंबल या कुर्सी पर बैठें, रीढ़ सीधी, हाथ आराम से रखे।
- कुछ मिनट नाक से स्वाभाविक साँस लें और शरीर को स्थिर होने दें।
- ध्यान का एक विषय चुनें और हफ्तों तक उसी पर रहें: नथुनों पर आती-जाती साँस, या मन में दोहराया गया ॐ।
- जब मन भटके, उसे पहचानें और बिना अपने को दोष दिए लौट आएँ। यह लौटना ही अभ्यास है।
- अंत में एक सूत्र धीरे-धीरे पढ़ें। विस्तार के लिए ध्यान कैसे करें से शुरू करें, और चरणों के लिए धारणा, ध्यान और समाधि।
राज योग की दूसरे मार्गों से तुलना के लिए देखें योग के मार्ग।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राज योग और हठ योग में क्या अंतर है?
हठ योग आसन, श्वास, मुद्रा और बंध से काम करता है; राज योग वह शांत मन है जहाँ ये ले जाते हैं। हठयोग प्रदीपिका कहती है कि दोनों एक-दूसरे के बिना सिद्ध नहीं होते (2.76)।
क्या राज योग और योगसूत्र एक ही हैं?
आज ज्यादातर हाँ: विवेकानंद के बाद से राज योग का अर्थ प्रायः पतंजलि के आठ अंग है। मध्यकालीन ग्रंथों में यह शब्द पहले लक्ष्य, यानी समाधि, के लिए था, और बाद में पतंजलि की पद्धति का नाम बना।
राज योग किसे करना चाहिए?
हर उस व्यक्ति को जो ध्यान और मन के अध्ययन की ओर खिंचता है। इसमें लचीलेपन से अधिक नियमितता चाहिए: स्थिर आसन, नैतिक जीवन और रोज की बैठक।
क्या यह ब्रह्माकुमारीज वाला राजयोग है?
नहीं। बीसवीं सदी का आंदोलन ब्रह्माकुमारीज इसी नाम से अपना ध्यान सिखाता है। विद्वान जेसन बर्च लिखते हैं कि ऐसी आधुनिक पद्धतियों का पतंजलि के आठ अंगों या हठ ग्रंथों के राज योग से बहुत कम संबंध है।
स्रोत
- स्वात्माराम की हठयोगप्रदीपिका, संस्कृत पाठ (GRETIL, गॉटिंगेन विश्वविद्यालय) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- पतंजलि, योगसूत्र, संस्कृत पाठ (GRETIL, गॉटिंगेन विश्वविद्यालय) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- Birch J. Rājayoga: The Reincarnations of the King of All Yogas. International Journal of Hindu Studies 17(3), 2013 DOI 10.1007/s11407-014-9146-x 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- The Hatha Yoga Pradipika, translated by Pancham Sinh (Allahabad, Panini Office, 1915; बाद का पुनर्मुद्रण), Internet Archive 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया