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भाषा : हिन्दी

गायत्रीgāyatrī · सावित्री

गायत्री मंत्र, एक-एक शब्द का अर्थ

4 मिनट में पढ़ें · 18 अक्टूबर 2026 को अद्यतन · स्रोत 18 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए

संक्षेप में

गायत्री मंत्र ऋग्वेद का मंत्र 3.62.10 है, जिसके ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं और जो सविता देवता, यानी सबको प्रेरित करने वाले सूर्य, को संबोधित है: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्। हमारा अनुवाद: हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज को धारण करें, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। इसके पहले प्रायः ॐ भूर्भुवः स्वः जोड़ा जाता है।

तीन हजार वर्षों से, सुबह, दोपहर और साँझ, ब्राह्मण घरों में सूर्य के सामने वही चौबीस अक्षर दोहराए जाते रहे हैं। गायत्री वेदों का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है, और उन सबसे पुरानी प्रार्थनाओं में से एक जिसे आज भी करोड़ों लोग रोज जपते हैं।

मंत्र का पाठ

ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

oṃ bhūr bhuvaḥ svaḥ | tat savitur vareṇyaṃ bhargo devasya dhīmahi | dhiyo yo naḥ pracodayāt ||

ॐ। पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग। हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज को धारण करें, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।

ऋग्वेद 3.62.10, व्याहृतियों सहित · हमारा अनुवाद

एक-एक शब्द का अर्थ

शब्दअर्थ
ॐपवित्र अक्षर, ॐ
भूःपृथ्वी
भुवःबीच का लोक, अंतरिक्ष
स्वःस्वर्ग, आकाश का लोक
तत्वह
सवितुःसविता का: «प्रेरक», वह सूर्य जो सब कुछ गति में लाता है
वरेण्यम्श्रेष्ठ, वरण करने योग्य
भर्गः (भर्गो)तेज, प्रकाश
देवस्यदेवता का
धीमहिहम धारण करें, हम ध्यान करें: इस रूप को दोनों तरह पढ़ा जाता है
धियः (धियो)बुद्धियाँ, विचार, अंतर्दृष्टियाँ (बहुवचन)
यः (यो)जो
नःहमारी
प्रचोदयात्प्रेरित करे, आगे बढ़ाए

गायत्री न धन माँगती है, न स्वास्थ्य। वह माँगती है कि दिव्य प्रकाश हमारी धी, यानी सोचने और देखने की शक्ति को जगाए: यह निर्मल बुद्धि की प्रार्थना है।

यह मंत्र कहाँ से आया है

यह ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त का दसवाँ मंत्र है। तीसरा मंडल परंपरा से ऋषि विश्वामित्र और उनके कुल का माना जाता है। थियोडोर आउफ्रेख्ट के संस्करण में, जो GRETIL पर उपलब्ध है, यह tat savitur vareṇyam bhargo devasya dhīmahi | dhiyo yo naḥ pracodayāt के रूप में है, संधि को छोड़ दें तो ठीक वैसा ही जैसा आज जपा जाता है।

ग्रंथों में

राल्फ टी. एच. ग्रिफिथ के सार्वजनिक-डोमेन अंग्रेजी अनुवाद (The Hymns of the Rigveda, दूसरा संस्करण, 1896) का भाव, हमारे अनुवाद में: «हम सविता देव की उस श्रेष्ठ महिमा को प्राप्त करें: वह हमारी प्रार्थनाओं को प्रेरित करे।»

आरंभ का ॐ भूर्भुवः स्वः ऋग्वेद के मंत्र का हिस्सा नहीं है। यह ॐ और तीन «महाव्याहृतियों», यानी तीन लोकों के नामों, को जोड़ता है। शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता 36.3) में यह मंत्र पहले से भूर्भुवः स्वः के साथ मिलता है, और कर्मकांड की परंपरा इसके आगे ॐ जोड़ती है।

नाम और छंद

गायत्री सबसे पहले एक छंद का नाम है: आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण, कुल चौबीस अक्षर। सविता देवता को संबोधित होने के कारण इस मंत्र को सावित्री भी कहते हैं। पहला चरण गिनें तो सात ही अक्षर मिलते हैं: तत्-स-वि-तुर्-व-रे-ण्यम्। वैदिक छंद आठवाँ अक्षर व-रे-णि-यम् पढ़कर पूरा करता है, और कई पारंपरिक वेदपाठी आज भी ऐसे ही बोलते हैं।

उपनिषद इस नाम पर मनन करते हैं। छांदोग्य उपनिषद (3.12.1) शुरू होता है गायत्री वा इदं सर्वं भूतम् से, «यह सब जो है, गायत्री ही है», और आगे कहता है कि वाणी गायत्री है, क्योंकि वाणी «गाती भी है और रक्षा भी करती है» (गायति च त्रायते च)। बृहदारण्यक उपनिषद (5.14.4) समझाता है: गायत्री ने गयों की रक्षा की, और गय प्राण हैं; इसीलिए उसका नाम गायत्री है। वह यह भी कहता है कि आचार्य जो सावित्री शिष्य को सुनाता है, वह उस शिष्य के प्राणों की रक्षा करती है।

परंपरा: संध्या और उपनयन

रूढ़िवादी ब्राह्मण परंपरा में गायत्री संध्या-वंदन का हृदय है, वह उपासना जो दिन की तीन संधियों में की जाती है। उपनयन (जनेऊ) संस्कार में पिता या आचार्य बालक को यह मंत्र देते थे, और इस दायरे के बाहर इसे नहीं सिखाया जाता था।

उन्नीसवीं सदी से सुधार आंदोलनों ने, जिनमें आर्य समाज भी था, और बीसवीं सदी के कई आचार्यों ने इसे सबके लिए खोल दिया, महिलाओं और गैर-ब्राह्मणों समेत। आज यह मंदिरों, स्कूलों, योग कक्षाओं और अनगिनत रिकॉर्डिंग में गाया जाता है। कुछ पारंपरिक परिवार और गुरु अब भी चाहते हैं कि इसे गुरु से ग्रहण किया जाए। भारत में आज दोनों दृष्टियाँ जीवित हैं; हम दोनों का सम्मान करते हुए यह पाठ प्रस्तुत करते हैं।

उच्चारण कैसे करें

«ॐ भूर्-भुवः स्वः / तत्-सवितुर्-वरेण्यम् (या वरेणियम्) / भर्गो देवस्य धीमहि / धियो यो नः प्रचोदयात्।»

  • प्रचोदयात् में या का आ दीर्घ है और अंतिम त् हलंत है: अंत में कोई स्वर न जोड़ें, «प्रचोदयाता» नहीं।
  • ध और भ महाप्राण हैं: हल्की साँस के साथ बोले जाते हैं।
  • भुवः, स्वः, नः का विसर्ग (ः) हल्की साँस की तरह है, बहुत धीमे सुनाई देता है; उसे जोर से «हा» न बनाएँ।
  • वैदिक पाठी उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर कान से सीखते हैं; किसी प्रशिक्षित वेदपाठी की रिकॉर्डिंग सबसे अच्छा आदर्श है।

जप की विधि

  1. सुबह पूर्व की ओर मुख करके बैठें, या दिन की दूसरी संधियों में सूर्य की ओर।
  2. कुछ शांत साँसें लें और अर्थ को याद करें: वह प्रकाश जो बुद्धि को प्रेरित करता है।
  3. धीरे-धीरे जप करें, जोर से या फुसफुसाकर, एक या दो साँसों में एक गायत्री।
  4. पारंपरिक संख्या 10, 28 या 108 है; 108 मनकों की जप माला गिनती में मदद करती है।
  5. अंत में एक मिनट मौन बैठें।

यदि आपने यह मंत्र किसी गुरु से ग्रहण नहीं किया है और जप करना चाहते हैं, तो उसी आदर से करें: बैठकर, ध्यान से, बिना जल्दबाजी के। संस्कृत मंत्रों का परिचय गायत्री को दूसरे महान मंत्रों के बीच रखता है, जिनमें इसका वैदिक साथी महामृत्युंजय मंत्र भी है। मंत्र के साथ ध्यान में बैठने की सरल विधि ध्यान कैसे करें में है।

जानने योग्य

गायत्री छंद में दूसरे देवताओं (गणेश, शिव, विष्णु…) को संबोधित कई बाद की «गायत्रियाँ» भी हैं। वे भक्ति की रचनाएँ हैं; इस पृष्ठ पर ऋग्वेद की मूल गायत्री है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गायत्री मंत्र का सरल अर्थ क्या है?

यह निर्मल बुद्धि के लिए प्रार्थना है: हम दिव्य सूर्य, सविता के तेज का ध्यान करते हैं, ताकि वह हमारे विचारों को प्रेरित करे और सही दिशा दे।

इसे गायत्री क्यों कहते हैं?

गायत्री इसके छंद का नाम है: आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण। उपनिषद इसमें एक अर्थ और जोड़ते हैं: यह गय, यानी प्राणों, की रक्षा (त्रा) करती है (बृहदारण्यक उपनिषद 5.14.4)।

क्या महिलाएँ गायत्री मंत्र का जप कर सकती हैं?

रूढ़िवादी परंपरा में यह उपनयन (जनेऊ) संस्कार में दिया जाता था। उन्नीसवीं सदी से आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलनों और कई आचार्यों ने इसे सबके लिए खोल दिया; कुछ परिवार और गुरु आज भी चाहते हैं कि इसे गुरु से ग्रहण किया जाए।

गायत्री मंत्र का जप कब करना चाहिए?

परंपरा से दिन की तीन संधियों (संध्या) में: सूर्योदय, दोपहर और सूर्यास्त, सूर्य की ओर मुख करके, प्रायः 10, 28 या 108 बार।

स्रोत

  1. ऋग्वेद-संहिता, संपादक आउफ्रेख्ट (1877), संस्कृत पाठ, मंत्र 3.62.10 (GRETIL) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
  2. Ralph T. H. Griffith, The Hymns of the Rigveda, vol. 1, 2nd edition (Benares, 1896), Internet Archive 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
  3. वाजसनेयि संहिता (शुक्ल यजुर्वेद), अध्याय 36, मंत्र 3, भूर्भुवः स्वः सहित (TITUS, फ्रैंकफर्ट) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
  4. बृहदारण्यक उपनिषद 5.14, गायत्री पर, संस्कृत पाठ (GRETIL) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
  5. छांदोग्य उपनिषद 3.12, गायत्री पर, संस्कृत पाठ (GRETIL) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया

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