महामृत्युञ्जयmahā-mṛtyuñjaya · मृत्यु को जीतने वाले महान
महामृत्युंजय मंत्र, मृत्यु पर महान विजय
3 मिनट में पढ़ें · 18 अक्टूबर 2026 को अद्यतन · स्रोत 18 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए
संक्षेप में
महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का मंत्र 7.59.12 है, जो यजुर्वेद में भी मिलता है: त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। हमारा अनुवाद: हम सुगंधित, पोषण बढ़ाने वाले त्रिनेत्र की उपासना करते हैं; जैसे पका खीरा अपनी बेल से छूट जाता है, वैसे ही मैं मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ, अमरता से नहीं।
सभी वैदिक मंत्रों में यही वह मंत्र है जो रोगी के सिरहाने, भोर में शिव मंदिरों में, और भय के समय परिवारों में जपा जाता है। इसका बिंब बगीचे से आता है: इतना पका हुआ खीरा कि वह अपने आप बेल से अलग हो जाए।
मंत्र का पाठ
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
oṃ tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭi-vardhanam | urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt ||
ॐ। हम सुगंधित, पोषण बढ़ाने वाले त्रिनेत्र की उपासना करते हैं। जैसे खीरा अपने डंठल से छूट जाता है, वैसे ही मैं मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ, अमरता से नहीं।
एक-एक शब्द का अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| त्र्यम्बकम् | तीन नेत्रों वाले (रुद्र-शिव); पुराना अर्थ «तीन माताओं वाले» भी हो सकता है |
| यजामहे | हम उपासना करते हैं, हम अर्पित करते हैं |
| सुगन्धिम् | सुगंधित |
| पुष्टिवर्धनम् | पोषण, वृद्धि और समृद्धि बढ़ाने वाले |
| उर्वारुकम् | खीरा, ककड़ी या लौकी जैसा फल |
| इव | की तरह |
| बन्धनात् | अपने बंधन से, अपने डंठल से |
| मृत्योः | मृत्यु से |
| मुक्षीय | मैं मुक्त हो जाऊँ |
| मा | नहीं |
| अमृतात् | अमरता से (मा अमृतात् मिलकर मामृतात् बनता है) |
ग्रंथों में
राल्फ टी. एच. ग्रिफिथ के सार्वजनिक-डोमेन अंग्रेजी अनुवाद (The Hymns of the Rigveda, 1897) का भाव, हमारे अनुवाद में: «हम त्र्यम्बक की उपासना करते हैं, जो समृद्धि को मधुरता से बढ़ाते हैं। जैसे खीरा अपने डंठल से, वैसे ही मैं मृत्यु से छूट जाऊँ, अमरता से वंचित न होऊँ।» उनकी टिप्पणी बताती है कि त्र्यम्बक रुद्र का नाम है।
पके खीरे का बिंब
यह मंत्र न तो जबरदस्ती मृत्यु से बचने की माँग करता है, न जीवन से कट जाने की। जब लौकी या खीरा पक जाता है, तो वह बिना फटे बेल से अलग हो जाता है। प्रार्थना उसी तरह की मुक्ति माँगती है: मृत्यु से ऐसे छूटना जैसे पका फल अपना डंठल छोड़ता है, और उससे अलग न होना जो मरता नहीं। इसीलिए यह मंत्र रोगी के लिए भी पढ़ा जाता है, जीवन की प्रार्थना के रूप में, और मरणासन्न व्यक्ति के लिए भी, शांत विदा की प्रार्थना के रूप में।
यह मंत्र कहाँ से आया है
ऋग्वेद में। यह सातवें मंडल के 59वें सूक्त का बारहवाँ मंत्र है; सातवाँ मंडल परंपरा से ऋषि वसिष्ठ का माना जाता है। सूक्त मुख्यतः मरुतों को संबोधित है, जो तूफान के देवता और रुद्र के पुत्र हैं; यह अंतिम मंत्र त्र्यम्बक नाम से स्वयं रुद्र की ओर मुड़ता है। GRETIL पर आउफ्रेख्ट का पाठ है: tryambakaṃ yajāmahe sugandhim puṣṭivardhanam | urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt।
यजुर्वेद में। यह मंत्र कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता 1.8.6) और शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता 3.60) में त्र्यम्बक को दी जाने वाली आहुतियों में आता है। शुक्ल यजुर्वेद इसी ढाँचे पर एक दूसरा पद जोड़ता है, जिसमें उपासक «यहाँ से मुक्त होऊँ, वहाँ से नहीं» (इतो मुक्षीय मामुतः) माँगता है।
नाम। «महामृत्युंजय», यानी मृत्यु को जीतने वाले महान, बाद में शैव परंपरा का दिया नाम है, जिसने शिव को मृत्यु का विजेता माना। मंत्र स्वयं त्र्यम्बक का नाम लेता है।
उच्चारण कैसे करें
«त्र्यम्-ब-कम् य-जा-म-हे सु-गन्-धिम् पुष्-टि-वर्-ध-नम् / उर्-वा-रु-क-मि-व बन्-ध-नान् मृत्-योर् मुक्-षी-य मा-मृ-तात्।»
- त्र्य एक ही अक्षर है: र के तुरंत बाद य जुड़ता है। «त्र-यम्-बकम्» बोलना आम गलती है।
- पुष्टि में ष और मुक्षीय में क्ष साफ बोलें; «मुक्षीय» को «मुच्छीय» न बनाएँ।
- मृत्योः, अमृतात् का ऋ छोटा स्वर है, «रि» के निकट।
- दीर्घ स्वर (यजामहे, उर्वारुकम्, मुक्षीय, मामृतात्) ह्रस्व स्वरों से दुगना समय लेते हैं।
कब और कैसे जपें
परंपरा इसे शिव से जोड़ती है: यह मंदिरों में, महाशिवरात्रि पर, शिव के दिन सोमवार को, और स्वास्थ्य तथा दीर्घायु के अनुष्ठानों में जपा जाता है। किसी के बीमार होने पर परिवार साथ बैठकर इसका जप करते हैं; बहुत बड़ी संख्या में जप के लिए पुरोहितों को भी बुलाया जाता है।
- पूर्व की ओर या शिव की प्रतिमा के सामने रीढ़ सीधी रखकर बैठें।
- एक बार धीरे-धीरे पढ़ें, पके खीरे के बिंब को याद करते हुए।
- 11 या 108 बार जप करें, जप माला पर गिनते हुए।
- अंत में मौन रहें, या ॐ नमः शिवाय (पंचाक्षर मंत्र) के साथ समाप्त करें।
यह मंत्र सार्वजनिक है: पूरे भारत में छपता, गाया और प्रसारित होता है। कुछ शैव परंपराओं में गुरु इसे विशेष निर्देशों के साथ औपचारिक रूप से भी देते हैं। दूसरा महान वैदिक मंत्र, गायत्री मंत्र, का अपना पृष्ठ है, और संस्कृत मंत्रों का परिचय दोनों को उनके संदर्भ में रखता है। मंत्र के साथ बैठने की सरल विधि ध्यान कैसे करें में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महामृत्युंजय मंत्र किसलिए जपा जाता है?
परंपरा में इसे बीमारी, संकट और मृत्यु के समय तथा शिव-पूजा में जपा जाता है। यह मृत्यु से वैसी मुक्ति माँगता है जैसे पका फल अपना डंठल छोड़ देता है; यह प्रार्थना है, चिकित्सा नहीं।
महामृत्युंजय मंत्र कितनी बार जपना चाहिए?
परंपरा से माला पर 108 बार, या 11-11 के समूह में। कुछ अनुष्ठानों में बहुत बड़ी संख्या का जप पुरोहित करते हैं।
क्या कोई भी महामृत्युंजय मंत्र का जप कर सकता है?
यह मंदिरों और घरों में खुले रूप से जपा जाता है। कुछ शैव परंपराओं में गुरु इसे विशेष निर्देशों के साथ देते हैं।
त्र्यम्बक कौन हैं?
रुद्र-शिव का एक नाम। परंपरा इसे «तीन नेत्रों वाले» के रूप में पढ़ती है; पुराना अर्थ «तीन माताओं वाले» भी हो सकता है। भाष्यों में दोनों अर्थ मिलते हैं।
स्रोत
- ऋग्वेद-संहिता, संपादक आउफ्रेख्ट (1877), संस्कृत पाठ, मंत्र 7.59.12 (GRETIL) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- Ralph T. H. Griffith, The Hymns of the Rigveda, vol. 2, 2nd edition (Benares, 1897), Internet Archive 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- तैत्तिरीय संहिता (कृष्ण यजुर्वेद) 1.8.6, संस्कृत पाठ (TITUS, फ्रैंकफर्ट) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया
- वाजसनेयि संहिता (शुक्ल यजुर्वेद) 3.60, संस्कृत पाठ (TITUS, फ्रैंकफर्ट) 18 अक्टूबर 2026 को जाँचा गया